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Showing posts from November, 2021

३. स्वप्ने

ख्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की, आप मुझे पहचानते हो बस इतना ही काफी है। अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे, जिसकी जितनी जरूरत थी उसने उतना ही पहचाना मुझे! जिन्दगी का फलसफा भी कितना अजीब है, शामें कटती नहीं और साल गुजरते चले जा रहे हैं! एक अजीब सी 'दौड़' है ये जिन्दगी, जीत जाओ तो कई  अपने पीछे छूट जाते हैं और हार जाओ तो अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं! बैठ जाता हूँ मिट्टी पे अक्सर, मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है। मूळ लेखन - मुंशी प्रेमचंद ( https://www.hindipool.com/munshi-premchand-poems-in-hindi/amp/ ) इच्छा नाही मला प्रसिद्ध होण्याची आता तुम्ही मला ओळखले इतके ही पुरेसे आहे... चांगल्यानी चांगले आणि वाईटानी वाईट समजले मला  जितकी ज्याची गरज होती त्याने तितके ओळखले मला  जगण्याचं शास्त्र इतके विचित्र आहे की  सूर्य मावळत नाही आणि वर्ष सरत जातात... जिंकलो तर आपले कोणीतरी मागे राहते आणि, अपयश आले तर आपलेच मागे टाकून जातात... मातीच्या जमिनीवर बसत असतो आजकाल मला माझी ऐपत प्रिय आहे... अनुवाद - जुईली अतितकर

१. का लागतो कागद परवानगीचा ?

"इजाजत का कागज क्यूं है लगता ?" ------------------------------------------ हमने अपने स्वार्थ के खातिर, देश की सीमाओं को तय कर दिया है । झगड़ों की शुरूआत यहीं हुई, अमन शांती को बरबाद कर दिया है । बांट कर खाने की प्रवृत्ति अब, धीरे-धीरे अदृश्य सी होती जा रही है । कुदरत ने हमें जो भी दिया है, मानव-जाती उसका बटवारा कर रही है । इंसान बटे हैं, कौम भी बट गई, हो गये हैं जमीं और खून के हजारों हिस्से । बज चुका है कयामत का बिगुल, खतरनाक बन पड़े हैं आसपास के किस्से । बांट ले इंसान तू कितना भी, कुदरत से तू कभी भी न जीत पायेगा । आज नहीं तो कल जरूर,  दिन दूर नहीं जो अस्तित्व तेरा मिट जायेगा । कुदरत तय करती है अपना जजबा, हम कभी नहीं ये समझ सकेंगे । क्या भूकंप, आंधी, चक्रवात को, हम इंसान क्या कभी रोक भी सकेंगे ? सूरज के किरणों को सीमा नहीं, चांद की चांदनी को सीमा नहीं होती । नदी के बहाव को सीमा नहीं, हवाओं के बहने को सीमा नहीं होती । कोई मुल्क पार करने को इन्हें, कभी कोई वीजा ही नहीं लगता । इंसान ने क्यूं बंदिशे डाली हैं खुद पर, फिर इजाजत का कागज क्यूं है लगता ? --------------------------------...